सेना से संवेदना

                                                 

आज बहुत दिनों बाद मैं इस ब्लॉग पर लौट रहा हूँ । बहुत सोचने के बाद मेरे ख्याल में एक मुद्दा है जिसपर बात करना , विचार करना मेरे हिसाब से बहुत जरुरी है और शायद इसलिए मैंने फिर से ब्लॉग के माध्यम को चुना है। अपनी बात शुरू करने से पहले में उस व्यक्ति का धन्यववाद करना चाहता हूँ जिन्होंने मुझे फिर से प्रेरित किया की मैं फिर लिखना शुरू करूँ ।
अब आते हैं आज के विषय पर , आज मैंने जो विषय चुना है वो आजकल के समचारों का मुख्य पहलु है । कभी भी दो ही मुद्दे हैं जिनपर सबसे ज्यादा बाते होती है ; १) राजनीति और २) सेना । मजे की बात ये है की ये दोनों आपस में जुड़े हुए हैं ।
हम सब को दुःख होता है जब एक जवान को बिना किसी कारण के आपने जान से हाथ धोना पड़ता है । वो जो ठण्ड में, गर्मी में , बरसात में हर वक़्त देश की रक्षा के लिए तत्पर रहता है और उसे जान गंवाना पड़ता है ।हम सब चाहते है जो सैनिक बेफजूल कारणों से जान गंवाता है उसके एक एक खून के कतरे का हिसाब होना चाहिए । सही भी है , सैनिक का सम्मान होना चाहिए , खूब होना चाहिए क्यूंकि एक सम्मान ही तो जिसके लिए वो दिन-रात मर रहा है । देश के बलिवेदी पर चढ़ता हर सैनिक को मेरा सलाम है और आज मैं उनके इसी शहादत पर लिखूंगा।
लेकिन आगे बढ़ने से पहले मैं ये साफ़ कर देना चाहता हूँ की इस लेख का कोई ताल्लुकात कश्मीर में हो रहे बर्बरतापूर्ण कृत्यों से या फिर छत्तीसगढ़ में हो अमानवीय हत्याओं से नहीं है ।
चलिए अब चलते हैं विषय पर ; मेरा एक प्रश्न है की सेना से कितनी संवेदना होनी चाहिए ? आज का ये लेख इस प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमेगा ।
जैसा की मैंने शुरू में  कहा की सैनिक तो सिर्फ सम्मान का भूखा है और जैसा जटिल कार्य वो करता है उसके लिए वो सम्म्मान का अधिकारी भी है पर क्या उस सम्मान को हम इस ओहदे पर पहुंचा दें की वो हमारे ही गले का फांस बन जाये ? मेरा कहने का अर्थ है की अगर सैनिक के शहादत पर हद से ज्यादा संवेदनशील हो जाओगे तो वो विध्वंशही लाएगा । इसका अर्थ ये बिलकुल है की सैनिक के शहादत की कोई कद्र नहीं होनी चाहिए । मगर उसकी सहाहदत को राष्ट्र और देश की अस्मिता और अखंडता से भी नहीं जोड़ना चाहिए । इसका अर्थ ये भी नहीं की सेना में जाने वाला व्यक्ति मरने जाता है लेकिन हाँ वो ये प्रण जरूर लेता है की वो अपना सर्वस्व समर्पण करेगा जोकि वो करता है और वो भी ये जानता की उसके प्राण अब उसके नहीं रहे; वो देश के नाम हो जाते हैं ।।
एक शहीद को तभी पूर्ण श्रद्धांजलि होगी जब हम उसके खून का हिसाब चूका लेंगे, ये हमारा कर्तव्य है और हम इससे पीछे नहीं हट सकते है।
पर इन सभी बातों के बावजूद मेरा मानना है की इसे जीवन-मरण का प्रश्न न  बना लें, इसे राष्ट्र जीवन का प्रधान विषय बना लिया जाए । राष्ट्र निर्माण में कई जाने जाती है और हम उन सभी के कर्जदार हैं । उनका कर्ज भी चुकाएंगे पर इसका अर्थ ये नहीं की राष्ट्र को देश को द्वन्द में धकेल दिया जाये ।।
हर सैनिक से संवेदना है लेकिन इतिहास गवाह है की जब जब सैनिकों ने या सैनिक विचारधारा ने सत्ता संभाली है विध्वंश हुआ है ।। पर सेना और सैनिक का सम्मान कभी काम नहीं होना चाहिए और इसलिए मैं श्री माखनलाल चतुर्वेदी जी की इस पंक्ति के साथ विदा लेना चाहूंगा:
                              मुझे तोड़ लेना वनमाली  उस पथ पर देना तुम फेंक,
                               मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पर जावें वीर अनेक॥॥

Comments

Popular posts from this blog

"'भगवा' शर्मसार है "

Idealism and Electoral Politics

अगर औरत रहेगी !!