राष्ट्रवाद की माथापच्ची
ये जो राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय अस्मिता की लड़ाई सोचने पर मजबूर करती है ये कहाँ ले जाएगी।। चलिए मान लिया की भारत राष्ट्र , विश्व शक्ति बन जायेगा उसके बाद क्या? फिर लड़ाई होगी अपने को श्रेष्ठ बनाये रखने की और अगर उसमे किसी को दबाना पड़ेगा तो दबाएंगे , यही होगा।। ऐसा करते करते हम मर जायेंगे, हमारे बच्चे मर जायेंगे उनके बच्चे भी मर जायेंगे।।
शायद इसे ही भारतीय विचार में भौतिकवाद का नाम दिया गया है । अरे हम परब्रह्म की बात करते हैं फिर इसमें ये राष्ट्र , देश कहाँ घुस गया।। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि मुझसे ही निकले हो , मुझमे ही विलीन हो जाओगे तो फिर हम किस ऊहापोह में फंसे हुए हैं ।।
यहाँ मैं ये बात साफ़ कर दूँ की मैं किसी प्रकार से वामपंथियों का समर्थन नहीं कर रहा हूँ , उनकी तो पूरी विचारधारा ही भौतिकवाद के इर्द गिर्द घूमती है ।।
ये राष्ट्र का बंधन , ये देश का बंधन तोडना चाहिए ।।
मुझे यह भी पता है की मेरी बातें impractical हैं लेकिन क्या करूँ मैंने यही महसूस किया है कि इस पूरे विवाद ने सिर्फ और सिर्फ नकारत्मकता को जन्म दिया है , जिसे देखो एक दूसरे पर लाँछन लगा रहा है , नेगेटिव एनर्जी का फ्लो बढ़ गया है ।
मुझे ये भी पता है कि ये सारी लड़ाई सत्ता पाने की है , किसी को किसी दूसरे की सत्ता एक फूटी आँख नहीं सोहाती है , साहब इतिहास के एक एक पन्ने को उठाकर देख लो, इस सत्ता की लड़ाई सिर्फ और सिर्फ खून बहाया है चाहे वो फिर राम की रावण से लड़ाई हो या ब्रिटिश साम्राज्य से भारत की । इस लड़ाई का कोई अंत नहीं है , ये दुःख ही पहुंचाएगा।।
इसका कोई फल नहीं दिखता, पर छोड़िये आध्यात्मिकता की बाते , चार्वाक की बात मान लो साहब , खाओ, पियो, और मर जाओ ज्यादा खुश रहोगे।
लेकिन आप फिर मुझसे सवाल करोगे की क्या देश की रक्षा नहीं करनी चाहिए , तो ऐसा है कि देश होना चाहिए या नहीं यही पहला प्रश्न , पर आपकी बात नामुमकिन लगती है कि देश हो ही न, तो ठीक है रक्षा कीजिये न , पारी पारी कर के कीजिये पर जीने मरने का सवाल न बना लीजिए , देखिये घर होगा तो रक्षा करना होगा पर घर के अंदर खाना कोई कैसे खाता है उनपे माथापच्ची मत कीजिये , कोई बैठ के खायेगा, कोई उल्टा लटक के खायेगा तो कोई हगते हुए भी खायेगा , इसे आबरू का प्रश्न मत बनाइये , सब खुश रहिएगा ।।
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