“ये अपमान किसका है”


दुःख होता है, दर्द होता है,
दिल पल – पल रोता है,
ये अपमान किसका है, पिड़िता का,
राष्ट्र का या जन-जन का,
मन-मष्तिष्क सोचने पे मज़बूर हो जाता है,
ये कैसे होता है, ये क्यूँ होता है।
ये आक्रोश किसका है, किसपे है, किसके लिए है॥
पनरहे किड़ो  का उत्तरदायित्व किसका है,
समाज में फ़ैला रहे गन्दगी हम हैं, तो क्या इनके रोगों के भागीदार हम नहीं हैं ?

डर लगता है सोच कर, अभी तो महाभारत होना बाकी है,
जब पाँचाली का अपमान राजदरबार में , युवराज के हाथों होना बाकी है।
ए वासुदेव अब इन्तजार ना कराओ, अपनी घड़ी को जरा तेज घुमाओ,
इन कष्टों से, दु:शासनो से नितांत दिलाओ।
रो रहा हुं , पर समझ नही आता रोऊँ किसके लिए,
पिड़िता के लिए, या अपनी जवाबदेही से भागने के लिए,
अपनी हरकतों के लिए

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